Thu. Apr 22nd, 2021

विशेष प्रतिनिधि

मुंबई । महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में इस बार भारतीय जनता पार्टी एक तरह से 164 सीटों पर चुनाव लड़ रही है और उसकी सहयोगी शिवसेना को 124 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा है। 289 सदस्यीय विधानसभा जिसमें 288 सीटों के लिए चुनाव हो रहा है का बहुमत का आंकड़ा 145 का है, इस हिसाब से भाजपा ने 164 सीटों पर चुनाव लड़ कर यह तो सुनिश्चित कर ही लिया है कि यदि उसकी सफलता का प्रतिशत पिछली बार की तरह रहा तो अकेले अपने दम पर पूर्ण बहुमत पाने में कामयाब रहेगी।
लेकिन मुद्दा यह नहीं है, बल्कि खास बात यह है कि इस बार सहयोगी दलों के 12 प्रत्याशी भाजपा के चुनाव चिन्ह पर मैदान में उतरेंगे। इसका अर्थ यह है कि चुनाव जीतने के बाद वे भाजपा के ही विधायक कहलाएंगे और दल-बदल कानून के दायरे में सदैव बने रहेंगे। एक तरह से भाजपा ने राज्य में नई राजनीति का सूत्रपात किया है। इससे महाराष्ट्र स्वाभिमान पक्ष, आरएसपी जैसे छोटे दलों का अस्तित्व इस विधानसभा चुनाव के बाद खत्म होने की कगार पर होगा। इन राजनीतिक दलों के विधायक चुनाव जीतने के बाद अपनी इच्छा से किसी दूसरे गठबंधन में शामिल नहीं हो सकेंगे क्योंकि ऐसा करने पर उनके समक्ष दल-बदल विरोधी कानून दीवार बनकर खड़ा हो जाएगा।
यही नहीं भाजपा ने एक तीर से कई निशाने साधे हैं।
यदि भाजपा को 164 में से 145 सीटें मिल जाती है तो वह अकेले ही बहुमत में रहेगी और शिवसेना की ब्लैकमेलिंग तथा दबाव से बची रहेगी। दूसरी तरफ शिवसेना भी ज्यादा सौदेबाजी करने की स्थिति में नहीं रहेगी।
भाजपा की लोकप्रियता महाराष्ट्र में सर्वाधिक है इसलिए भाजपा अपने दम पर पूर्ण बहुमत का सपना देख रही है। शिवसेना भी इस सच्चाई से वाकिफ है इसलिए शिवसेना ने चुपचाप भाजपा को उसकी मनमानी करने का अवसर दे दिया। अब देखना यह है कि चुनाव बाद क्या हालात बनते हैं। क्या भाजपा अकेले अपने दम पर सरकार बनाने में समर्थ रहेगी अथवा पिछले चुनाव की तरह 122 या उसके आसपास सिमट जाएगी। हालात चाहे कैसे हों, लेकिन यह तय है कि सबसे बड़ी पार्टी भाजपा को ही बनना है क्योंकि उसने 152 सीटों पर अपने प्रत्याशी खड़े किए हैं और 12 सीटों पर सहयोगियों को टिकट दिया है, उनका चुनाव चिन्ह भी कमल ही है। इस प्रकार महाराष्ट्र की 164 सीटों पर एक तरह से भाजपा ही चुनावी मैदान में है और मुकाबला दिलचस्प हो चुका है।

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