Tue. Apr 13th, 2021

विशेष प्रतिनिधि

नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या में राम जन्मभूमि विवाद की सुनवाई पूरी होते ही जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में राम मंदिर आंदोलन के दौरान बनी चर्चित डॉक्यूमेंट्री को दिखाया है। इस फिल्म के प्रदर्शन और रिलीज को लेकर शुरुआत से ही दक्षिणपंथी संगठन विरोध में रहे हैं। देश के सबसे बड़े विवादित और चर्चित मुद्दे में राम मंदिर का मुद्दा शामिल है और मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में भी है। इसी दौरान जेएनयू के छात्र संघ ने इस डॉक्यूमेंट्री को फिर से दिखाकर इस मामले को फिर से तूल दे दिया है।
दक्षिणपंथी संगठन इस डॉक्यूमेंट्री के रिलीज होने से लेकर विश्विद्यालयों में इसके प्रदर्शन का विरोध के विरोध में रहे हैं। इन संगठनों मं विश्व हिंदू परिषद, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और अखिल भारतीय विद्यार्थी संगठन (एबीवीपी) जैसे संगठन शामिल हैं। इसे 1993 में मुंबई के एक कॉलेज में दिखाए जाने से रोका गया था। 2002 में अमेरिकन म्यूजियम ऑफ नेचुरल हिस्ट्री में इसका शो नहीं होने दिया गया। 2014 में लॉ कॉलेज में भी इसके एक शो के बाद मिली धमकियों के बाद इसके आगे के शो रद्द करने पड़े थे। 2019 में हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी में भी इसका प्रदर्शन रोक दिया था। फिल्म में बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा के दौरान होने वाले हिंसा को भी दिखाया है।
सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या में राम मंदिर का केस अपने निर्णायक दौर में है। लेकिन 1992 में बाबरी मस्जिद तोड़े जाने की घटनाक्रम को लेकर एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाई जिसका नाम है ‘राम के नाम’। यह डॉक्यूमेंट्री फिल्म शुरुआत से चर्चा में रही है। फिल्म की स्क्रीनिंग को लेकर जो पोस्टर तैयार किया उसमें लिखा हुआ था कि जेएनयू छात्र संघ (जेएनयूएसयू ऑफिस है छात्रों का, वीसी का जागीर नहीं। यह स्क्रीनिंग रात 9 बजे की गई। जेएनयू कैंपस में राम मंदिर के मुद्दे को फिर से हवा देने की कोशिश की जा रही है। जेएनयू कैंपस में ‘राम के नाम’ फिल्म की स्क्रीनिंग उस दिन की गई जिस दिन सुप्रीम कोर्ट में इस मुद्दे पर बहस खत्म हुई। फिल्म की स्क्रीनिंग पर जेएनयू छात्र संघ की अध्यक्ष आईसी घोश ने कोई ठोस जवाब नहीं दिया और सिर्फ आरएसएस और सरकार को कोसती रहीं।
इससे पहले जेएनयू प्रशासन ने छात्र संघ के ऑफिस को बंद करने का नोटिस जारी किया था जिसके विरोध में छात्र संघ शाम से ही प्रदर्शन कर रहे थे। यह फिल्म उसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए एक प्रोटेस्ट के तौर पर दिखाई गई है। अब देखना यह है कि इस फिल्म की स्क्रीनिंग के बाद जेएनयू में किस तरह का विरोध होता है और क्या प्रशासन इस पर कोई कार्रवाई करता है।

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