Fri. Feb 26th, 2021

– 11 साल पुराने मध्य प्रदेश के मामले में दिया बड़ा फैसला 

विशेष संवाददाता 

नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अदालतों को सजा देने के पहलुओं को हल्के में नहीं लेना चाहिए। सजा तय करते वक्त अदालत को ध्यान रखना चाहिए कि इसका समाज पर निर्णायक असर पड़ता है। प्राकृतिक न्याय का मूल सिद्धांत है कि जज को किसी नतीजे पर पहुंचने के लिए कारण बताना चाहिए। सजा कम या ज्यादा नहीं, बल्कि वाजिब होनी चाहिए। जस्टिस एनवी रमना, जस्टिस मोहन एम शांतनगौदर और जस्टिस अजय रस्तोगी की पीठ ने कहा, बड़ी संख्या में ऐसे मुकदमे दायर होते हैं, जो निचली अदालतों द्वारा अपर्याप्त या गलत सजा देने से संबंधित होते हैं। कुछ मामले में लापरवाह तरीके से सजा दी जाती है, जिसे लेकर हम आगाह करते रहे हैं। पीठ ने कहा, सजा तय करते वक्त अपराध की योजना, अपराध में इस्तेमाल हथियार, आरोपी की भूमिका, पीडि़त की स्थिति, अपराधी की उम्र व लिंग, आर्थिक स्थिति, आपराधिक पृष्ठभूमि, आरोपी की मनोस्थिति, आरोपी के सुधरने की गुंजाइश, अपराध की गंभीरता आदि बातों पर गौर किया जाना चाहिए। सजा तय करने को लेकर जज को स्वाधीनता होती है लेकिन जरूरी यह है कि इसे सैद्धांतिक तरीके से अंजाम दिया जाए।
मध्य प्रदेश के एक गांव में 15 अप्रैल 2008 को गाय घर में घुसने से नाराज एक व्यक्ति अपने साथियों के साथ कुल्हाड़ी व लाठी लेकर पड़ोसी के घर पर हमला बोल दिया था। आरोपियों ने पड़ोसी को बुरी तरह मारा पीटा। पुलिस ने चार आरोपियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया था। निचली अदालत ने चारों आरोपियों को आईपीसी की धारा-326, 34 और 452 के तहत दोषी करार देते हुए तीन-तीन वर्ष कैद की सजा सुनाई और जुर्माना भी किया। बाद में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच ने चारों द्वारा जेल में बिताए चार दिनों को ही सजा करार दिया। हालांकि जुर्माने की रकम बढ़ा दी। अब सुप्रीम कोर्ट ने आरोपियों को तीन-तीन महीने की सजा और एक-एक लाख रुपए जुर्माना लगाया। वहीं 80 वर्षीय एक आरोपी को दो माह की सजा और 65 हजार का जुर्माना लगाया है। कोर्ट ने तीनों को हिरासत में लेने का आदेश दिया है।

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