Fri. Apr 23rd, 2021

विशेष संवाददाता

नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट ने राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद में एक और हिंदू पक्ष को अपना लिखित नोट दाखिल करने की इजाजत दी है। इस वादी ने गुरुवार को कोर्ट से अनुरोध किया था कि यदि शीर्ष अदालत यह व्यवस्था देती है कि हिंदू और मुस्लिम पक्ष में से किसी का भी 2.77 एकड़ विवादित भूमि पर मालिकाना हक साबित नहीं पाया, तो इसे सरकारी जमीन घोषित किया जाए। उमेश चंद्र पाण्डे, जिन्हें वर्ष 1961 में दायर वाद में यूपी सुन्नी केंद्रीय वक्फ बोर्ड ने प्रतिवादी बनाया था, ने सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष अयोध्या मामले का जिक्र किया और राहत में बदलाव के बारे में लिखित नोट दाखिल करने की अनुमति चाही।
मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने अयोध्या में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट के सितंबर, 2010 के फैसले के खिलाफ दायर अपीलों पर 16 अक्टूबर को सुनवाई पूरी की थी। संविधान पीठ ने सभी पक्षों से कहा था कि सुनवाई के दौरान उठे मुद्दों के परिप्रेक्ष्य में वे राहत में बदलाव के बारे में 19 अक्टूबर तक लिखित नोट दाखिल करें ताकि कोर्ट निर्णय के योग्य मुद्दों को सीमित कर सके। पांडे की ओर से सीनियर वकील वी शेखर ने गुरुवार को लिखित नोट दाखिल करने की अनुमति मांगी, तो मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की, कि हम समझ रहे थे कि अयोध्या प्रकरण पूरा हो गया है। हालांकि, पीठ ने उन्हें यह नोट दाखिल करने की अनुमति दे दी।
पांडे ने अपने नोट में कहा है कि लॉर्ड डलहौजी ने वर्ष 1856 में अवध के नवाब को अपदस्थ करने के बाद अवध की पूरी रियासत को अपने अधीन कर ली थी। बाद में लार्ड कैनिंग ने 3 मार्च, 1858 में एक आदेश जारी कर अवध की सारी भूमि के मालिकाना हक ब्रिटिश सरकार के पक्ष में जब्त कर लिया था। नोट में कहा गया है कि इसलिए अयोध्या की विवादित भूमि नजूल (सरकार) की जमीन हो गई और आज भी वही स्थिति बरकरार है। इसे मुस्लिम पक्षकारों ने भी स्वीकार किया है। शीर्ष अदालत ने इससे पहले मंगलवार को निर्वाणी अखाड़ा को लिखित नोट दाखिल करने की अनुमति दी थी। इस नोट में निर्वाणी अखाड़ा ने उस स्थल पर श्रृद्धालु के रूप में रामलला की पूजा अर्चना के प्रबंधन का अधिकार देने का अनुरोध किया था। इस मामले में निर्मोही अखाड़ा और निर्वाणी अखाड़ा दोनों ही रामलला विराजमान के जन्मस्थल पर पूजा और प्रबंधन के अधिकार चाहते हैं।

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