Fri. Apr 23rd, 2021

विशेष संवाददाता

नई दिल्ली । हरियाणा में 75 पार का नारा देने वाली भाजपा अपना पुराना प्रदर्शन भी नहीं दोहरा पाई, जबकि करीब पांच महीने पहले हुए लोकसभा चुनाव में पार्टी ने विपक्ष का सूपड़ा साफ करते हुए राज्य की 90 विधानसभा सीटों में से 79 पर बढ़त हासिल की थी। दरअसल, इस विधानसभा चुनाव में भाजपा के राष्ट्रवाद के मुद्दे पर जाट-मुस्लिम-दलितों की एकजुटता भारी पड़ गई। बाकी रही सही कसर अति आत्मविश्वास, गुटबाजी, गलत टिकट वितरण और कार्यकर्ताओं से दूरी ने पूरी कर दी। राज्य में पार्टी के बुरे प्रदर्शन के पीछे महज पांच महीने पहले लोकसभा में मिली प्रचंड जीत है। इस जीत के कारण न सिर्फ राज्य सरकार और राज्य इकाई पीएम नरेंद्र मोदी के करिश्मे के भरोसे ढीली पड़ गई, बल्कि टिकट वितरण में भी लापरवाही बरती गई। कई बड़े नेताओं ने समर्थकों को टिकट न मिलने पर उन्हें निर्दलीय के रूप में मैदान में न सिर्फ उतारा बल्कि अंदरखाने पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार के खिलाफ जमकर समर्थन भी दिया। इसका परिणाम यह रहा कि लोकसभा चुनाव में 55 फीसदी वोट हासिल करने वाली पार्टी को इस चुनाव में करीब 20 फीसदी वोटों का नुकसान हुआ।
टिकट वितरण में खामी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बतौर बागी मैदान में उतरे भाजपा नेताओं ने पृथला, पुंडरी, महम और दादरी में बाजी मारी और इसके अलावा आधा दर्जन सीटों पर पार्टी उम्मीदवारों की जीत की संभावनाओं पर पानी फेर दिया। बीते चुनाव में भाजपा ने खुलकर जाट बनाम गैर जाट की राजनीति नहीं की थी लेकिन इस बार उल्टा था। इस कारण जाट और मुसलमान बिरादरी ने भाजपा के खिलाफ रणनीतिक तौर से वोटिंग की, जबकि कई सीटों पर दलित बिरादरी जाट और मुसलमान के साथ खड़ी हो गई। यही कारण है कि ज्यादातर जाट विधायक, मंत्री और उम्मीदवारों को हार का सामना करना पड़ा है। अब भले ही भाजपा सरकार बनाते दिख रही हो, मगर मतों की गिनती के दौरान कांग्रेस और जेजेपी के प्रदर्शन ने कई बार भाजपा की मुश्किलें बढ़ाई। यदि जेजेपी के हाथ में सत्ता की चाबी होती, तो दोबारा सरकार बनाने के सपने को ग्रहण लग सकता था। जेजेपी ने कांग्रेस से हाथ मिलाने और भाजपा से दूरी बनाने का साफ संदेश दे चुकी थी। मगर कांग्रेस-जेजेपी का आंकड़ा 41 पर अटक जाने के बाद नेतृत्व ने चैन की सांस ली।
चुनाव में सात निर्दलीयों, इनेलो व हलोपा के एक-एक उम्मीदवारों को जीत मिली है। निर्दलीयों में से पांच नैनपाल रावत, रणधीर गोलम, धर्मपाल कुदर, बलराज कुंडू और ओमवीर सांगवान भाजपा के बागी हैं। इसके साथ पार्टी को इनेलो के इकलौते विधायक अभय चौटाला के साथ हलोपा के इकलौते विधायक गोपाल कांडा से समर्थन की उम्मीद है। इसके अलावा बादशाहपुर से जीते राकेश दौलतावाद का किसी दल से करीबी नहीं रही है, ऐसे में इनके समर्थन की भी उम्मीद है। चुनाव में कांग्रेस की मजबूत स्थिति के संकेत के साथ ही भाजपा ने अपने बागी उम्मीदवारों से संपर्क साधना शुरू कर दिया था। इस क्रम में चुनाव जीतने वाले पांचों बागियों से पार्टी नेताओं ने लगातार संपर्क साधे रखा। इसी दौरान दूसरे निर्दलीय विधायकों से भी बातचीत शुरू की गई। चुनाव नतीजे से पीएम मोदी और अध्यक्ष अमित शाह खासे नाराज बताए जाते हैं। खास कर चुनाव के दौरान गुटबाजी से नुकसान के कारण नेतृत्व ने रिपोर्ट तलब की है। सरकार गठन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद सियासी माहौल शांत होने पर केंद्रीय नेतृत्व राज्य इकाई और सरकार में बड़ी सर्जरी करेगा।
बहरहाल, मई 2019 में लोकसभा चुनाव के दौरान जिस तरह ‘मोदी मैजिक’ ने हरियाणा में भाजपा को रिकार्ड जीत नसीब करवाई थी, वही मैजिक पांच महीनों में ही बेअसर दिखाई दिया। अक्टूबर 2019 के इस विधानसभा चुनाव में मोदी मैजिक के सहारे चुनाव लड़ सत्तारूढ़ भाजपा सरकार को झटका लगा है। इस चुनाव में ’75 पार’ का लक्ष्य लेकर चल रही हरियाणा भाजपा 40 का आंकड़ा भी बमुश्किल छू पाई। इस मिशन के लिए हरियाणा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत गृहमंत्री अमित शाह, यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ, स्मृति ईरानी, हेमा मालिनी, सनी दओल, राजनाथ, नितिन गडकरी जैसे बड़े चेहरों समेत 40 स्टार प्रचारकों ने ताकत झोंकी थी। बावजूद इसके हरियाणा में भाजपा ‘मनोहर’ जीत से दूर ही रही।
अब कांग्रेस की बात करें तो पार्टी की ओर से बड़े स्टार प्रचारक प्रचार राहुल गांधी ही रहे। सोनिया व प्रियंका गांधी प्रचार के लिए हरियाणा नहीं आ पाई। राहुल गांधी ने नूहं और महेंद्रगढ़ में दो बड़ी रैलियां की और दोनों जगह कांग्रेस जीती। जबकि इन रैलियों का प्रभाव आसपास की सीटों पर भी देखने को मिला। राजस्थान के सीएम अशोक गहलोत और छत्तीसगढ़ के सीएम भूपेश बघेल, वीरेंद्र सहवाग ने भी हरियाणा के रण में कांग्रेस की जीत के लिए पसीना बहाया। फिर कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व ने हरियाणा में भूपेंद्र सिंह हुड्डा के हाथों में चुनाव की कमान सौंपी जरूर लेकिन इतनी देरी से कि प्रदर्शन सुधरने के बावजूद पार्टी सत्ता के लिए जरूरी बहुमत तक नहीं पहुंच सकी। गुटबाजी के बावजूद हुड्डा ने 17 विधायकों वाली पार्टी को 31 के आंकड़े तक पहुंचा दिया। टिकट दिलाने में हुड्डा की ही चली। 90 सीटों में से 60 पर पसंदीदा उम्मीदवारों को टिकट दिया गया था। पार्टी नेतृत्व हुड्डा की अपेक्षा अशोक तंवर पर अंतिम समय तक भरोसा करती रही लेकिन तंवर ने न सिर्फ पार्टी नेतृत्व का भरोसा तोड़ा बल्कि राज्य में हुड्डा और उनके समर्थकों के खिलाफ आवाज बुलंद किए रहे। नेतृत्व तंवर के लिए हुड्डा को नाराज किए रही लेकिन पार्टी उन पर भरोसा कर चुनाव लडऩे को लेकर आश्वस्त भी नहीं दिखी। कांग्रेस नेतृत्व ने भी हरियाणा चुनाव को गंभीरता से नहीं लिया। राहुल गांधी मजबूरी में केवल दो रैलियों को संबोधित करने के लिए गए। अगर ऐसा न होता तो तस्वीर कुछ और होती।

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