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विशेष संवाददाता

नई दिल्ली। निर्भया रेप केस में दोषी फांसी से बचने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं। अब चार में से तीन दोषियों ने फांसी से बचने के लिए क्यूरेटिव और दया याचिका का रास्ता अपनाने की बात कही है। तिहाड़ जेल प्रशासन ने उन्हें नोटिस जारी कर इसके बारे में पूछा था। दोषियों ने जवाब में कहा कि संविधान के हिसाब से उनके पास अभी कानूनी रास्ते बचे हैं। वह अभी क्यूरेटिव और दया याचिका का इस्तेमाल करना चाहेंगे। बता दें कि निर्भया गैंगरेप और मर्डर मामले में चारों दोषियों (पवन, विनय, मुकेश और अक्षय) की रिव्यू पिटिशन पहले ही खारिज हो चुकी है। चारों की रिव्यू पिटिशन सुप्रीम कोर्ट से खारिज हुई थी।
कानूनी जानकारों की मानें तो फांसी पर लटकाए जाने से पहले अभी कई कानूनी उपचार बचे हुए हैं। रिव्यू पिटिशन के बाद क्यूरेटिव पिटिशन दाखिल किए जाने का प्रावधान है और उसके बाद दया याचिका दायर की जाती है और वहां से भी अर्जी खारिज हो जाए तब दोषी के नाम डेथ वॉरंट जारी किया जाता है और फिर पूछी जाती है की आखिरी इच्छा क्या है। कानूनी जानकार अमन सरीन बताते हैं कि क्यूरेटिव पिटिशन में मुजरिम जजमेंट के तकनीकी पहलुओं की ओर ध्यान दिलाता है और सवाल उठाता है कि जजमेंट में कहा उपचार की जरूरत है। लेकिन इसके लिए सीनियर एडवोकेट की सिफारिश की जरूरत होती है। सीनियर वकील की सिफारिश के बिना क्यूरेटिव दाखिल नहीं हो सकती। क्यूरेटिव पिटिशन अभी तक किसी भी मुजरिम की ओर से दाखिल नहीं की गई है। क्यूरेटिव पिटिशन पर चैंबर में कोर्ट फैसला लेती है। क्यूरेटिव पिटिशन पर चैंबर में सुनवाई होती है सुप्रीम कोर्ट अगर क्यूरेटिव पिटिशन को भी खारिज कर दे फिर दया याचिका दायर किए जाने का प्रावधान है।
संवैधानिक प्रावधान के तहत रिव्यू पिटिशन और क्यूरेटिव खारिज होने के बाद दया याचिका दायर किए जाने का प्रावधान है। हाई कोर्ट के वकील नवीन शर्मा बताते हैं कि राष्ट्रपति के सामने दाखिल दया याचिका पर राष्ट्रपति अनुच्छेद-72 के तहत दया याचिका पर फैसला करते हैं जबकि राज्यपाल 161 के तहत याचिका पर फैसला लेते हैं। इसके तहत कानूनी प्रावधान ये है कि राष्ट्रपति केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय से रिपोर्ट मांगते हैं और गृह मंत्रालय संबंधित राज्य सरकार से रिपोर्ट मांगती है। रिपोर्ट देखने के बाद सरकार अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति के पास भेजती है और फिर राष्ट्रपति दया याचिका पर फैसला लेते हैं। दया याचिका भी अगर खारिज हो जाए उसके बाद डेथ वॉरंट जारी होता है। डेथ वारंट में फांसी की तारीख और समय तय की जाती है।
कानूनी प्रावधान कहता है कि अगर मुजरिम की दया याचिका भी खारिज हो जाए उसके बाद निचली अदालत से फांसी पर लटकाए जाने के लिए डेथ वॉरंट जारी होता है। हाई कोर्ट के वकील अजय दिग्पाल बताते हैं कि जब किसी मुजरिम का कोई भी पिटिशन कहीं पर भी पेंडिंग नहीं होता तब जेल अथॉरिटी इस बारे में सरकारी वकील के माध्यम से कोर्ट को सूचित करते हैं। निचली अदालत जहां से पहली बार मुजरिम को फांसी की सजा सुनाई गई होती है वह कोर्ट अर्जी पर सुनवाई के बाद डेथ वॉरंट जारी करता है और डेथ वॉरंट जारी करने और फांसी पर लटकाए जाने के बीच कम से कम 15 दिन का गैप होता है ताकि इस दौरान मुजरिम को ये बताया जा सके कि उसके पास कोई कानूनी उपचार बचा हुआ है या नहीं। डेथ वॉरंट जारी होने के बाद मुजरिम के फांसी की समय और तारीख तय की जाती है।
एडवोकेट रेखा अग्रवाल बताती हैं कि डेथ वॉरंट जारी होने के बाद जेल अथॉरिटी उस दोषी को बाकी कैदियों से अलग रख देता है और उसके सेल से तमाम चीजें जैसे कपड़े बर्तन आदि हटा लिए जाते हैं और ऐसी कोई भी चीज उसके पास नहीं रहने दी जाती जिससे वह खुद को नुकसान पहुंचा सके। साथ ही मुजरिम की निगरानी के लिए 24 घंटे का पहरा शुरू हो जाता है। जिस दिन फांसी पर लटकाया जाना होता है उस दिन मुजरिम को कहा जाता है कि उसकी याचिकाएं खारिज हो चुकी हैं और उसे फांसी पर लकटाया जाएगा। फांसी की तारीख पर मैजिस्ट्रेट दोषी से मिलता है और उससे आखिरी इच्छा पूछी जाती है। इस दौरान यह पूछा जाता है कि अगर दोषी के नाम कोई संपत्ति है तो वह किसके नाम उसे करना चाहता है। दोषी के कहने के मुताबिक प्रॉपर्टी आदि ट्रांसफर कर दी जाती है।

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