Mon. Mar 1st, 2021

विशेष प्रतिनिधि

लखनऊ। क्या भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर यूपी में बीएसपी प्रमुख मायावती के नेतृत्व को चुनौती दे पाएंगे, क्या चंद्रशेखर दलित राजनीति में बने समीकरण को बदलने का माद्दा रखते हैं? एक कार्यकर्ता से राजनेता के रूप में बदलाव के दौरान चंद्रशेखर अपनी छाप छोड़ पाएंगे? ये सवाल तब उठे जब उन्होंने एक अलग राजनीतिक दल के गठन का ऐलान किया। ऐसे संकेत हैं कि 2022 में यूपी में होने वाले विधानसभा चुनाव से वह अपने सियासी सफर का आगाज कर सकते हैं। जब से प्रदेश में मायावती ने दलित राजनीति पर अपना प्रभुत्व जमाया है, तब से लेकर अब तक यह पहला ऐसा राजनीतिक दल होगा जो प्रदेश में दलित राजनीति के नाम पर सामने आएगा।
चंद्रशेखर अब तक अलग-अलग आंदोलनों का चेहरा बने हैं। सोशल मीडिया पर भी वह दलितों के नेता के रूप में प्रॉजेक्ट हुए। हाल में जब पूरे देश में नया दलित नेतृत्च सामने आ रहा है, चंद्रशेखर भी दलित युवाओं के एक हिस्से के बीच पोस्टर बॉय बन कर उभरे हैं।अब तक के राजनीतिक ट्रेंड को देखते हुए चंद्रशेखर के लिए उत्तर प्रदेश में अपनी राजनीतिक मौजूदगी दर्ज कराना आसान नहीं होगा। पहले ही यहां एसपी-बीएसपी के रूप में दो मजबूत क्षेत्रीय दल हैं तो बीजेपी-कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय दल भी यहां मौजूद हैं। इनके बीच सियासी जगह बनाना बहुत ही कठिन होगा। लेकिन कांग्रेस और एसपी जैसे राजनीतिक दलों की इन पर नजर हो सकती है। खास कर कांग्रेस चंद्रशेखर के राजनीतिक सफर पर नजदीकी नजर रख सकती है। राज्य में चंद्रशेखर अगर मायावती के वोट में सेंध लगाने में कामयाब होते हैं तो कांग्रेस उन्हें संभावित सहयोगी के रूप में देख सकती है। मालूम हो कि आम चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने मेरठ जाकर चंद्रशेखर से अस्पताल में मुलाकात तक की थी। हालांकि बाद में चंद्रशेखर ने उनसे दूरी बना ली थी।
चंद्रशेखर का प्रभाव पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अधिक है और यहां कई सीटों पर मुस्लिम और दलित समीकरण निर्णायक फैक्टर माना जाता है। हालांकि अब तक वे कांग्रेस या एसपी से खुद को अलग रखते रहे हैं। लेकिन अब आने वाले समय में वे अपने पुराने स्टैंड में बदलाव करने का संकेत दे सकते हैं। लेकिन इसके बाद भी वे मायावती के वोट बैंक को किस स्तर तक भेद पाएंगे यह कहना जल्दबाजी होगी।वहीं, राजनीतिक दल बनाने के ऐलान को चंद्रशेखर की ओर से मायावती पर दबाव बनाने की रणनीति भी कुछ लोग मान रहे हैं। अब तक मायावती ने चंद्रशेखर को पूरी तरह से नजरअंदाज किया है। मायावती की रणनीति रही है कि दलितों के बीच कोई समानांतर नेतृत्व तैयार न हो तो चंद्रशेखर लगातार उनके साथ जाने की बात कह कर पहले से तैयार प्लैटफॉर्म पर अपना राजनीतिक सफर शुरू करने का संकेत देते रहे हैं। हालांकि मायावती ने इसमें कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। तब जाकर उन्हें अपना राजनीतिक दल बनाने का ऐलान करना पड़ा।दरअसल, उनकी टाइमिंग भी इस दबाव राजनीति की ओर से इशारा करती है। मायावती अपने सबसे कठिन राजनीतिक दौर से गुजर रही हैं। उनकी पार्टी गंभीर समस्या से ग्रसित है। ऐसे में वह नई चुनौती के सामने आने के विकल्प को स्वीकार नहीं करेंगी।

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