Sun. Feb 28th, 2021

विशेष प्रतिनिधि

नई दिल्ली। नागरिकता संशोधन एक्ट के खिलाफ विपक्षी पार्टियां एकजुट हो रही हैं। केरल सरकार ने विधानसभा में इस कानून के खिलाफ प्रस्ताव पेश कर दिया और केरल ने इसे ना लागू करने का ऐलान किया है। नागरिकता का कानून पूरी तरह से केंद्र के हाथ में होता है, लेकिन एनपीआर को लेकर राज्यों का सहयोग जरूरी है। केरल सरकार के कदम के बाद अब केंद्र सरकार नया तरीका लाने पर विचार कर रही है, जिसके तहत CAA की पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन कर दी जाएगी। CAA को लागू करने में किसी तरह का अवरोध ना हो, इसको लेकर अब CAA को पूरी तरह से ऑनलाइन करने की तैयारी चल रही है। इसके अलावा गृह मंत्रालय मौजूदा प्रावधानों को बदलने की भी सोच रहा है, अभी तक नागरिकता की प्रक्रिया डीएम के हाथ में है। लेकिन केंद्र सरकार इसे बदल सकती है। इस प्रोसेस को ऑनलाइन ले जाने के बारे में गृह मंत्रालय के अधिकारी ने कहा कि अगर ये ऑनलाइन रहेगी, तो राज्य सरकारों का इसमें कोई रोल ही नहीं रहेगा और ऐसे में जिसे नागरिकता चाहिए होगी वह आसानी से हासिल कर लेगा। अधिकारी के अनुसार, संविधान के सातवें शेड्यूल की यूनियन लिस्ट के हिसाब से इस कानून पर राज्य सरकार का अधिकार नहीं है। यूनियन लिस्ट में ऐसी कुल 97 बातें हैं जो सिर्फ केंद्र के अधिकार में आती हैं, जिनमें नागरिकता, रेलवे, विदेश नीति और रक्षा नीति जैसे अधिकार आते हैं।
केरल की विधानसभा में जिस तरह प्रस्ताव पास हुआ है, वैसा ही प्रस्ताव अब तमिलनाडु और महाराष्ट्र में भी लाने की मांग हो रही है। विपक्ष की मांग है कि विधानसभा से प्रस्ताव पारित कर इस कानून का आधिकारिक विरोध होना चाहिए। केरल के मुख्यमंत्री पिनरई विजयन का कहना है कि CAA के जरिए केंद्र सरकार देश को धार्मिक आधार पर बांटना चाहती है। उन्होंने कहा कि अगर कानून संसद में पास हो गया, इसका मतलब ये नहीं है कि हमें गैर-संवैधानिक कानून को राज्य में पास कर दें। केरल, पंजाब, बंगाल समेत अन्य राज्यों की ओर से जो विरोध हो रहा है उस पर केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद का कहना है कि संसद से पास हुए कानून को पूरे देश में लागू किया जाता है और नागरिकता देने का अधिकार राज्य नहीं सिर्फ केंद्र के पास है। उन्होंने कहा कि CAA किसी भी भारतीय नागरिक की नागरिकता नहीं छीनता है। गौरतलब है कि केंद्र सरकार के द्वारा जो कानून लाया गया है उसके तहत बांग्लादेश, अफगानिस्तान, पाकिस्तान से आने वाले हिंदू, जैन, बौद्ध, सिख, ईसाई और पारसी शरणार्थियों को भारत की नागरिकता दी जाएगी।

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